बह चला बह चला

बह चला, बह चला……

इन हवाओं में उठ रही सी घुन में बह चला

इन वादियों की जो ये खूबसूरती है 

उन में बह चला

धाराएं जो ये बह रहीं हैं उन में बह चला

उड़ते बादलों से भी ऊंची उड़ान ले चला

बह चला हो बह चला…….
इन सपनो की उमंगों में बह चला

उमंगे जिन वजहों से उठ रहीं हैं उन में बह चला

बच्चों की जो मुस्कानों से उठ रही साज में बह चला

जो ये खूबसूरत से चेहरे हैं उन पे मर चला

बह चला बह चला हो बह चला……..
बूढ़े आदमी के वात्सल्य को देखकर कह चला

की आशाओं के जो दीप जलते हैं वो बुझते नहीं हैं

उड़ते पञ्चियाँ जिनको घर बदलना है वो रुकते नहीं हैं 

जिंदगी की जो ये राग है वो बहती ही रहती है

बह चला बह चला हो बह चला……..
तारे जो ये टिमटिमाते हैं, उनको आशाएं कह चला

बर्फ जो ये पिघल रही हैं, समर्पण कह चला

रास्ते जो ये बट रही हैं, 

 रिश्ते कह चला

नदियां जो ये मिल रही हैं, अपने कह चला

बह चला बह चला होओ बह चला…….

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8 Comments Add yours

  1. aruna3 says:

    Bahut khoobsoorat.

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    1. Thank you!
      Mam, Glad you liked it.

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      1. aruna3 says:

        Pleasure is mine.

        Liked by 1 person

  2. pandeysarita says:

    बहुत सुंदर!! बहने को मन कर गया

    Liked by 1 person

    1. धन्यावाद! पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

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    2. ऐसे शब्द मनोबल बढ़ते हैं।

      Liked by 1 person

    1. Thank you! Glad you liked it.😁😊

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